आजके मेरे हिंदी पाठकों को,मेरे बचपन में कई बार सुनी एक कहानी सुनाता हूँ.किसकी लिखी हुई है ये तो अब याद नहीं पर है बहुत रोचक .
कई साल पहले एक शास्त्र ज्ञाता पंडित था,जो एक दिन एक तोता अपने घर ले आया। पंडित ने हुक्म दिया की यह तो कोई मामूली तोता नहीं,इसे तो अ-आ-क-ख नहीं श्लोक सीखना चाहिए,इसे सोने के पिंजरे में रखा जाए। ऐसा ही हुआ ,एक सुन्दर सोने का पिंजरा उस तोते के लिए मंगवाया गया ,और दो शिष्य दिन रात उसकी सेवा में और श्लोक सिखाने में लग गए। कूछ दिनों के बाद, जब पंडित आया तो उसने देखा की तोता तो चुपचाप अपने में पिंजरे में उदास बैठा है,श्लोक तो क्या गाना भी नहीं गाता। ये तो अनस्विकार्य था,पंडित ने पूछा इसे क्या खिलाते हो?शिष्यों ने कहा,छोला और गुड। क्या?एक महापंडित का तोता साधारण गुड-चने खाता है?तभी तो यह कुछ नहीं सीखता ! इसे रोज शुद्ध घी के पकवान खिलाओ ,और दो गुना मेहनत करवाओ। अब गुरु के आदेश की मजबूरी थी, दोनों शिष्य जोर शोर से तोते को खिलाने और वेदपाठी बनाने में जुट गए। सारा घर मंत्रोच्चारण से भर उठा। नज़ारा देखने की भीड़ बडती गयी ,तो जलने वालों की भी। कुछ ने कहा की ये तो ज़रा भी नहीं बोलता ,तो कूछ ने कहा की इस तोते की किस्मत तो देखो,राज पकवान और पिंजरा वो भी सोने का!अब शिष्य भी कमर कास के जुट गए किसी भी तरह से इसे शिक्षित बनाना है,तो वो अपने श्लोक पत्र के पन्ने, ज़बरदस्ती तोते को खिलाने लगे, की शायद ऐसे ही इसकी बुद्धि का विकास हो। अब तक पाठक समझ गए होंगे की इस तोते का अंजाम क्या हुआ होगा। जी हाँ !पंडित के घर का मूर्ख तोता चल बसा। फिर क्या हुआ?होना क्या था !महा धूम धाम से वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ उस तोते की अंत्येष्टि की गयी। शहर भर से लोग श्राद्ध खाने पहुंचे और कहने लगे,कितना अभागा तोता था,इतने महा पंडित का घर रास नहीं आया। आखिर पंडित के घर का तोता था,कोई मामूली तोता नहीं।
ये कहानी आज और याद आ रही है,जब मेरी बेटी की मध्य कालीन परीक्षाएं सामने हैं.क्या हम अपने बच्चों को उसी तोते की तरह बनाने में नहीं जुटे हैं?सोने के पिंजरे जैसे स्कूलों में,जहाँ भले ही शीतातप नियंत्रित कमरे हों,पर खेलने के लिए खुला आसमान नहीं,भले ही गेम जोन के बीछे हुए गलीचे हों,पर नंगे पांव खेलने के लिए हरी घास नहीं। क्या उम्दा हॉर्लिक्स /कॉम्प्लान जूनियर पिलाकर और महँगी से महँगी उपहार देकर ही हम सोचते हैं की उनके व्यक्तिव को हम निखार सकते हैं जिससे और बेहतर बनाने की दौड में वह अव्वल आ जाएं ?अगर ऐसा है,तो आप उन्ही पंडित की तरह मूर्ख है,अपने बच्चे को क्लास में रटने और सिर्फ बोर्ड से नक़ल करना नहीं,उन्हें सिखाइए की किस तरह शिक्षा एक जीवनमूल्यों का मापदंड है,बनती और टूटती हुई समाज का प्रतिविम्ब भी है शिक्षा। शिक्षकों को भी पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं,पढ़ाये हुए विषयों को सरलता से समझाने के लिए प्रेरित कीजिये,नहीं तो वो दिन दूर नही,जब हम अपनी आँखों के सामने एक कृत्रिम और जीवन मूल्यों से रहित प्रजन्म को खड़ा पाएंगे।
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